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RTI का हाल : सूचना का अधिकार बना इंतजार का अधिकार, लंबित आवेदनों के मामले में महाराष्ट्र टॉप पर

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द फॉलोअप डेस्क 
महाराष्ट्र, जिसे कभी भारत में सूचना का अधिकार आंदोलन (RTI Movement) की जन्मभूमि कहा जाता था, आज उसी राज्य में RTI अपीलें सालों से ठप पड़ी हैं। जुलाई 2025 तक राज्य सूचना आयोग की वेबसाइट पर 74,639 दूसरी अपीलें लंबित दर्ज हैं। इनमें सबसे अधिक मामले राज्य मुख्यालय (15,945), नाशिक (13,297) और अमरावती (12,725) डिवीजन में अटके हुए हैं।


मुंबई में हालात सबसे बदतर
मुंबई की स्थिति सबसे चिंताजनक है। BMC (बृहन्मुंबई महानगरपालिका) से जुड़ी अपीलें अब सीधे राज्य आयोग में सुनी जा रही हैं। नतीजा यह है कि यहां फिलहाल 2022 की अपीलें सुनी जा रही हैं—यानि तीन साल की देरी। सामाजिक कार्यकर्ता जीतेन्द्र घाडगे ने बताया कि उनकी दिसंबर 2021 की अपील अब तक लंबित है। उनके मुताबिक, “जब तक फैसला आता है, तब तक जानकारी बेमानी हो जाती है। इससे भ्रष्टाचार छिपाने वालों को ही फायदा मिलता है।”
आयोग की कार्यशैली पर सवाल
जुलाई 2025 में नए मुख्य सूचना आयुक्त राहुल पांडे ने 3,542 मामलों का निपटारा किया, लेकिन अलग-अलग डिवीजनों का प्रदर्शन बेहद असमान है। अमरावती के आयुक्त रविंद्र ठाकरे ने महज़ 166 मामले निपटाए, जबकि उनके पास सबसे अधिक अपीलें लंबित हैं।
सवाल यह भी उठता है कि आयोग ने अब तक यह नहीं बताया कि जुलाई 2023 से जून 2024 के बीच कितने सूचना अधिकारियों (PIOs) पर जुर्माना लगाया गया। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि आयुक्त दंडात्मक कार्रवाई से बचते हैं, जिससे सरकारी विभाग RTI को नजरअंदाज करने में और बेखौफ हो जाते हैं।


सेवानिवृत्त अफसरों का वर्चस्व
आयोग की नियुक्तियों में भी पारदर्शिता पर सवाल खड़े हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार अब तक 96% सूचना आयुक्त पुरुष और महज़ 4% महिलाएं रही हैं। इनमें 86% सेवानिवृत्त सरकारी अफसर, जबकि सिर्फ 11% वकील और 4% पत्रकार रहे। वरिष्ठ RTI कार्यकर्ता राजेश रूपारेल का कहना है, “जब रिटायर्ड अफसर मौजूदा अफसरों पर फैसला करते हैं तो जवाबदेही हाशिए पर चली जाती है। सरकार को पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी आयुक्त बनाना चाहिए।”
RTI आंदोलन में अग्रणी महाराष्ट्र आज खुद अपनी पारदर्शिता की परीक्षा में नाकाम दिख रहा है। लंबित अपीलों का पहाड़ और जुर्माने के आंकड़ों पर चुप्पी नागरिकों के भरोसे को कमजोर कर रही है। सवाल यह है कि जब सूचना आयोग ही जवाबदेही से बच रहा है, तो आम नागरिक सरकार से जवाब कैसे मांग पाएंगे?


 

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